Shree Maha Ganapathi Navarna Vedapada Stavam – श्री महागणपति नवार्ण वेदपादस्तवः – श्रीकण्ठतनय श्रीश श्रीकर श्रीदलार्चित।

श्रीमहागणपति नवार्ण वेदपादस्तवः भगवान गणपति जी की स्तुति में रचित एक अद्वितीय स्तोत्र है, जिसमें वेदों के नवार्ण (नौ अक्षरों) के माध्यम से उनकी महिमा का गुणगान किया गया है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान, और भौतिक समृद्धि प्रदान करता है।

||श्रीमहागणपति नवार्ण वेदपादस्तवः ||

श्रीकण्ठतनय श्रीश श्रीकर श्रीदलार्चित ।
श्रीविनायक सर्वेश श्रियं वासय मे कुले ॥ १॥

गजानन गणाधीश द्विजराज-विभूषित ।
भजे त्वां सच्चिदानन्द ब्रह्मणां ब्रह्मणास्पते ॥ २॥

णषाष्ठ-वाच्य-नाशाय रोगाट-विकुठारिणे ।
घृणा-पालित-लोकाय वनानां पतये नमः ॥ ३॥

धियं प्रयच्छते तुभ्यमीप्सितार्थ-प्रदायिने ।
दीप्त-भूषण-भूषाय दिशां च पतये नमः ॥ ४॥

पञ्च-ब्रह्म-स्वरूपाय पञ्च-पातक-हारिणे ।
पञ्च-तत्त्वात्मने तुभ्यं पशूनां पतये नमः ॥ ५॥

तटित्कोटि-प्रतीकाश-तनवे विश्व-साक्षिणे ।
तपस्वि-ध्यायिने तुभ्यं सेनानिभ्यश्च वो नमः ॥ ६॥

ये भजन्त्यक्षरं त्वां ते प्राप्नुवन्त्यक्षरात्मताम्।
नैकरूपाय महते मुष्णतां पतये नमः ॥ ७॥

नगजा-वर-पुत्राय सुर-राजार्चिताय च ।
सुगुणाय नमस्तुभ्यं सुमृडीकाय मीढुषे ॥ ८॥

महा-पातक-सङ्घात-तम-हारण-भयापह ।
त्वदीय-कृपया देव सर्वानव यजामहे ॥ ९॥

नवार्ण-रत्न-निगम-पाद-संपुटितां स्तुतिम् ।
भक्त्या पठन्ति ये तेषां तुष्टो भव गणाधिप ॥ १०॥

॥ इति श्रीमहागणपति-नवार्ण-वेदपाद-स्तवः समप्तः ॥

इसका पाठ करने से साधक को ज्ञान, विवेक, और आत्मशक्ति की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र जीवन में आने वाले सभी प्रकार के विघ्न-बाधाओं का अंत करता है। स्तोत्र का नित्य जाप करें और भगवान गणपति की कृपा से जीवन को विघ्नमुक्त, समृद्ध, और आनंदमय बनाएं।

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