Shri Vallabhesha Hrudayam – श्री वल्लभेश हृदगम् – ऋष्याधिकम् मूल मंत्र वधेव परिकीर्तिधाम।
“श्री वल्लभेश हृदगम्” भगवान श्री गणेश जी की आराधना में रचित एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है। “हृदगम्” का अर्थ है “हृदय तक पहुंचने वाला”। यह स्तोत्र भक्त के हृदय को शुद्ध और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण करता है। श्री वल्लभेश्वर गणपति का यह स्तोत्र भक्त को आत्मिक शांति, मनोकामना सिद्धि, और संकटों से मुक्ति प्रदान करता है।
|| श्री वल्लभेश हृदगम् ||
ऋष्याधिकम् मूल मंत्र वधेव परिकीर्तिधाम।।1।।
ॐ विघ्नेसा पूर्वथा पथु, गण नादस्तु दक्षिणे,
पश्चिमे गज वक्त्रं तु उथरे विघ्न नासीना।। 2।।
आगनेतां पितृ भक्तस्य तु नैर्यथ्यं स्कंद पूर्वजा,
वायव्यं आखु वाहनस तु ईसान्यां देव पूजिथा।। 3।।
ऊर्ध्वत्थ पथु सुमुखो ह्यधारायं पथु गजानन,
येवं दासा दिसा रक्षेत् विकटा पापा नासना,।। 4।।
शिकायम कपिल पथु मूर्धन्या आकाश रूप द्रुक,
किरीति पथु न फलम्, ब्रूवोर मध्य विनायक ।।5।।
चक्षुशी मय त्रिनयना, श्रवणौ गज कर्णका,
कपालयोर माधा निधि, कर्ण मूले मादोथ काटा, ।।6।।
सदन्थो दन्त मध्ये अव्याथ, वक्त्रं पथु हरथमजा
चिबुके नासिके चैव पथु माम पुष्करेक्षणा।।7।।
उत्तरोष्टे जगत्व्यापी, त्वधरोष्ठेमृतप्रदः,
जिह्वाम् विद्या निधि पथु थलुन्या आपत् सहायक, ।।8।।
किन्नाराई पूजिथा कंदम, स्कन्धौय पथु दिसाम पथि,
चथुर भुजजो भुजजो पथु, बहु मूले अमारा प्रिया।। 9।।
अम्स्योर अंबिका सूनुर, अंगुलिश्चा हरि प्रिया,
अनन्तं पथु स्वतन्त्रो, मय मन प्रह्लाधा कारक।।10।।
प्राणापानौ तधा व्यानं उधनं च समानकं,
यसो लक्ष्मीं च कीर्तिंच पथु न कमला पथि।।11।।
हृदयं तु परा-ब्रह्म-स्वरूपो जगत् पथि,
स्थाणौ थु पथु विष्णुर मय स्थान मध्यम थु संकर, ।।12।।
उधरं तुंधिला पथु, नाभिम पथु सुनाभिका,
कटिम पथ्वा अमलो नित्यं, पथु मध्यम तु पावना।।13।।
मेद्रं पथु महा योगी, ठ्ठ पार्श्व सर्व रक्षक,
गुह्यम्न महाग्रज पथु, अनुम पथु जीतेन्द्रिय, ।।14।।
शुक्लम् पथु सुशुक्लम्, तू ऊरू पथु सुख प्रधा,
जंग देसे ह्रुस्व-जंघो, जानु मध्ये जगद् गुरु।।15।।
गुल्फौ रक्षक पथु, पढ़ौ मय नर्थना प्रिया,
सर्वांगम सर्व संधौ च पथु देवारी मर्दना।।16।।
पुथरा मिथ्रा कलथ्राधिन पथु पसंगुसाधिपा,
धन धान्य पसूमसा चैव ग्रहं क्षेत्रं निरंतरम्।।17।।
पथु विश्वात्माको देवो, वरदो भक्त वत्सला,
रक्षा हीनं तु यथ स्थानं, कवचेन विना कृतम्।।18।।
तथा सर्व रक्षयेद देवो मार्ग वासी जितेन्द्रिय,
अदव्यं पर्वतग्रे वा मार्गे मानवे मनागे।।19।।
जल स्थल गति वापि पथु माया अपरहारक,
सर्वत्र पथु देवेसा, सप्त लौकिक संश्रिता।।20।।
फला श्रुति।
या इदं कवचं पुण्यं पवित्रं पाप नासनं,
प्रथा काले जपेन मार्थया सदा भय विनाशनम्।।21।।
कुक्षी रोग प्रशमनम्, लूथा स्फोट निवारणम्,
मुथरा क्रुचा प्रशमनम्, बहु मुथरा निवारणम्।।22।।
बाला ग्रहाधि रोगानाम नासानम, सर्व कामधाम,
या पदेथ धारयेत् वापि करास्थस तस्य सिद्धया।
यत्र यत्र गाथाश्चपि ठठत्र ठठरा सिद्धिम्।।23।।
यत्र श्रृणोति पदाथि द्विजोथमो,
विघ्न राजा कवचम् धिन धिन,
पुथरा पौथरा सुकलत्र सम्पधा,
काम भोगं अखिलमसा च विंदति।।24।।
यो ब्रह्मा चारिणाम अचिन्त्यम् अनेक रूपम्,
ध्याये जग त्रय हिते रथं आपदघ्नम,
सर्वार्थसिद्धि लभते मनुष्यो,
विघ्नेशसायुज्यमुपेन्न संशयः।।25।।
इति श्रीविनायकातंत्रे श्रीवल्लभेशहृदगम् सम्पूर्णम् ।
श्री वल्लभेश हृदगम् का नियमित पाठ करें और भगवान गणपति की असीम कृपा से जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि का अनुभव करें।